सरकार बनाने के लिए न सूत है न कपास, फिर भी विपक्ष में लट्ठम लट्ठा!

नई दिल्ली। जिस तरह बारिश होने से पहले सभी जीव अपने लिए छाया और बुनियादी जरूरतों के लिए इंतजाम करने में जुट जाते हैं, वैसे ही इन दिनों विपक्ष भी जुटा हुआ है। लोकसभा चुनाव के बीच, नतीजे आने से पहले महागठबंधन ‘मिशन सरकार’ मोड में आ गया है। भाजपा नीत एनडीए के खिलाफ महागठबंधन की मोर्चेबंदी तेज हो गई है। सरकार बनाने को लेकर विपक्षी खेमे में जबरदस्त मंथन जारी है।

इस खेमे की अगुवाई टीडीपी प्रमुख व आंध्र प्रदेश के मुख्‍यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और टीआरएस अध्यक्ष व तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव कर रहे हैं। चंद्रबाबू नायडू विपक्षी नेताओं को एकजुट करने की कवायद के तहत उनसे लगातार मिल रहे हैं। इस क्रम में उन्होंने दिल्‍ली में कांग्रेस अध्‍यक्ष राहुल गांधी के साथ बैठक की, राकांपा अध्‍यक्ष शरद पवार से मिले, कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी और आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से भी मुलाकात की। इन नेताओं के बीच नतीजों के बाद की रणनीति पर काफी बातचीत हुई।

राहुल गांधी के साथ नायडू की मुलाकात इस मायने में भी खास है, क्योंकि एक दिन पहले ही राहुल ने गठबंधन से सरकार बनाने के संकेत दिए थे। भाजपा को सत्ता में वापसी करने से रोकने के लिए उन्होंने विपक्ष के हर फॉर्मूले पर सहमति जताई है।

इसके बाद नायडू का लखनऊ में सपा अध्‍यक्ष अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती से भी मिलने का कार्यक्रम है। यह मुलाकात अहम इसलिए है, क्योंकि चुनाव नतीजों के बाद अगर तीसरे मोर्चे की संभावना दिखती है तो उसमें महागठबंधन की भूमिका बेहद अहम रहेगी।

टीडीपी प्रमुख के भाकपा महासचिव सुरवरम सुधाकर रेड्डी, एलजेडी नेता शरद यादव से भी मिलने की संभावना है। हालांकि नायडू की यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात फिलहाल संभव नहीं हो सकी। आगे हो सकती है। हां, शरद पवार और सोनिया गांधी की मुलाकात जल्द हो सकती है।

इन मुलाकातों के दौरान बातें क्या होती होंगी, यह तो पता नहीं, लेकिन इतना जरूर है कि जाते-जाते चंद्रबाबू नायडू सभी से ’23 मई के बाद ध्यान रखना’ जरूर कहते होंगे।

बात के चंद्रशेखर राव की करें तो अपने तईं वह भी विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश में जुटे हैं। राव ने पिछले हफ्ते केरल में मुख्यमंत्री और माकपा नेता पिनरई विजयन से मुलाकात की थी। इसके बाद चेन्नई जाकर डीएमके नेता एमके स्टालिन से भी मिले। हालांकि यह बैठक कामयाब नहीं रही। डीएमके ने कांग्रेस का साथ छोड़ने से इंकार कर दिया। तीसरे मोर्चे की कवायद को यह एक बड़ा झटका है।

इस बीच एक मजेदार बात देखने को मिली है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद एक दिन बयान देते हैं कि केंद्र से एनडीए सरकार हटाने के लिए उनकी पार्टी पीएम पद का ‘त्याग’ कर सकती है। दूसरे ही दिन अपने बयान से पलटते हुए कहते हैं कि, यह सच नहीं है कि कांग्रेस पार्टी पीएम पद के लिए दावेदारी नहीं पेश करेगी। कांग्रेस देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है और अगर 5 साल सरकार चलाना है तो जाहिर है कि सबसे बड़ी पार्टी को ही मौका मिलना चाहिए।

यानी अभी सरकार बनी नहीं, पीएम पद के दावेदार पहले आ गए। इससे पहले केसीआर ने भी डिप्टी पीएम पद पर अपनी दावेदारी की तरफ इशारा किया था। पीएम और डिप्टी पीएम पद को लेकर अभी से ‘चूहे-बिल्ली’ का खेल विपक्ष की तरफ से होने लगा है, इस पर सिर्फ हंसी ही आ सकती है।

बहरहाल, 23 मई को नतीजे आने से पहले ही विपक्षी नेताओं की इन बैठकों के दौर ने सियासी गलियारों का तापमान बढ़ा दिया है। नायडू और केसीआर विपक्ष को एकजुट करने में कितना कामयाब हो पाते हैं, यह तो समय बताएगा, लेकिन जन रुझान और तमाम एग्जिट पोल एनडीए के अलावा दूसरे या तीसरे किसी भी मोर्च की संभावना को खारिज कर रहे हैं।

माहौल भाजपा की अगुवाई में एनडीए के पक्ष में बना हुआ है। पिछले पांच वर्षों में मोदी सरकार द्वारा किए गए कामकाज, विदेशों में भारत का बढ़ता रुतबा और आर्थिक मोर्चे पर मिल रही कामयाबी से जनता के बीच भाजपा सरकार में भरोसा बढ़ा है। देश में ‘एक बार फिर मोदी सरकार’ का नारा जोर-शोर से चल रहा है। इन सब फैक्टर को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि विपक्ष की यह पूरी कवायद ‘व्यर्थ’ है। अभी उनके पास न कहीं सूत है न कपास, फिर भी सरकार और पीएम पद को लेकर लट्ठम लट्ठा शुरू हो गई है!