दूसरो को पीएम-सीएम बनाने का दावा करने वाले प्रशांत किशोर नेतागिरी में हो गये फेल, ये है खास वजह

पटना। जदयू उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर दलगत राजनीति में ना जम सके और ना ही रम सके, शायद इसी वजह से उन्होने वापस चुनावी रणनीतिकार बनने का फैसला लिया है। भले उनकी रणनीति का कोई जवाब ना हो, लेकिन एक नेता के रुप में पीके अपनी छाप नहीं छोड़ सके, अगर यूपी विधानसभा चुनाव 2017 को छोड़ दिया जाए, तो प्रशांत को हर जगह कामयाबी मिली, लेकिन बिहार में एक नेता के रुप में वो कुछ भी खास नहीं कर सके।

कौन हैं प्रशांत किशोर 
प्रशांत किशोर वैसे तो मूल रुप से बिहार के सासाराम जिले के रहने वाले हैं, लेकिन उनका बचपन बक्सर में बीता है, फिलहाल उनकी उम्र करीब 42 साल है, उनके पिता पेशे से डॉक्टर थे, हाल ही में उनका निधन हुआ है, प्रशांत के बड़े भाई अजय किशोर दिल्ली में रहते हैं, उनकी दो बहनें भी हैं, पीके की शुरुआती पढाई बिहार में ही हुई है, वो यूनिसेफ में भी नौकरी कर चुके हैं। जहां पर उन्होने सीखा कि किसी मुद्दे को कैसे लोगों के बीच लोकप्रिय बनाना है।

2011 में नरेन्द्र मोदी से मुलाकात
पीके ने हाल ही में एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्होने कुपोषण को लेकर भारत के समृद्ध राज्यों की तुलना करते हुए एक लेख लिखा था, जिसमें गुजरात की शिकायत की थी, जिसके बाद उन्हें तत्कालीन सीएम नरेन्द्र मोदी के ऑफिस से बुलावा आया, उन्होने मोदी से मुलाकात की और उन्हें प्रभावित किया, जिसके बाद उन्हें वाइब्रेंट गुजरात के ब्रांडिग की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिसे उन्होने अच्छे तरीके से किया, धीरे-धीरे पीके मोदी के करीबी बन गये, वो सीएम आवास में रहकर ही काम करते थे, फिर उन्हें चुनाव प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपी गई, पहले 2013 गुजरात विधानसभा चुनाव, फिर 2014 लोकसभा चुनाव, दोनों ही चुनाव में पीके ने खुद को साबित किया।

2015 में नीतीश के साथ 
हालांकि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के कुछ महीने बाद ही प्रशांत उनसे नाराज हो गये, जिसके बाद नीतीश कुमार से उनकी मुलाकात हुई, नीतीश ने उन्हें 2015 बिहार विधानसभा चुनाव की जिम्मेदारी सौंपी, सुशासन बाबू को तीसरी बार सत्ता में लाने में पीके ने बड़ी भूमिका निभाई, इसके साथ ही मोदी लहर को पीके ने बिहार में थमा दिया। प्रशांत ने कई नारा गढा, जो लोगों की जुबान पर चढ गया।

यूपी में हार 
बिहार में जीत के बाद राहुल गांधी ने पीके से कहा, कि क्या वो यूपी में कांग्रेस के लिये रणनीति बना सकते हैं, पीके ने रणनीति बनाना शुरु किया, लेकिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के साथ वो तालमेल नहीं बिठा सके, जिसकी वजह से कांग्रेस बुरी तरह से हारी। हालांकि 2017 में ही पीके ने कांग्रेस को पंजाब जिताया। इसके बाद उन्होने रणनीति के काम से सन्यास ले लिया था, पीके फिर 2019 आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव से वापस लौटे, (क्योंकि ये कमिटमेंट पहले से था) उन्होने जगन मोहन रेड्डी के लिये रणनीति बनाई, और जगन भारी बहुमत से सत्ता में आये।

सक्रिय राजनीति से किनारा 
पिछले साल जब प्रशांत किशोर ने जदयू ज्वाइन किया था, तो उन्होने कहा था कि अब वो जदयू या उसके सहयोगी दलों के लिये ही रणनीति बनाएंगे, नीतीश ने उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया और पार्टी का भविष्य कहा, जिसके बाद कहा जाने लगा, कि नीतीश ने अपना उत्तराधिकारी चुन लिया है, लेकिन पीके के नंबर दो होने से पार्टी के ही कुछ लोग उनके खिलाफ पत्ते बिछाने लगे, अब लग रहा है कि पीके वापस रणनीति के काम में ही लौट आये हैं, उन्होने 2021 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिये ममता बनर्जी से बात की है। वो दीदी को वापस सत्ता में लाने के लिये रणनीति बनाएंगे।