कारगिल के 20 साल: कहानी उन हीरोज की जिनके आगे पस्त हो गया पाकिस्तान का ‘डर्टी-4’

आज 26 जुलाई को देश कारगिल विजय दिवस मना रहा है। 20 साल पहले आज के ही दिन हमारे वीर जवानों ने पाक के ‘डर्टी-4’ जिसमें उस समय पाकिस्तानी सेना के प्रमुख रहे जनरल परवेज मुशर्रफ, जनरल अजीज, जनरल महमूद और ब्रिगेडियर जावेद हसन शामिल थे, के नापाक मंसूबों को नाकाम कर दिया था।

डर्टी-4 ने कारगिल का प्लान बनाया यह सोचकर बनाया था कि अगर भारत उन्हें कारगिल से खदेड़ने की कोशिश करेगा तो उसे कश्मीर से अपनी सेना को मूव कराना पड़ेगा। डर्टी फोर की प्लानिंग थी कि अगर भारत ने ऐसा कुछ किया तो कश्मीर में उसकी स्थिति कमजोर हो जाएगी। ऐसे में वे और ज्यादा मुजाहिदीन (आतंकवादी) कश्मीर भेजेंगे। जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ के बाद आतंकी भयंकर मारकाट मचाएँगे, इस तरह भारत को दो मोर्चों पर लड़ाई लड़नी पड़ेगी, भारत को गुरिल्ला वार में फँसाने की पूरी साजिश इन चारों के दिमाग की ही उपज थी। पहले तो कारगिल में पाकिस्तान अपने सैनिकों की संलिप्तता से इनकार करता रहा पाक लेकिन बाद में उसका झूठ बेनकाब हो गया।

बलिदान की गाथा 

वैसे, युद्ध में पकड़े जाने वाले सैनिकों के साथ बर्बरता करने के मामले में पाकिस्तान का रिकॉर्ड हमेशा से खराब रहा है। अंतरराष्ट्रीय कानूनों को धता बताते हुए पाकिस्तान के ऐसे कई कारनामे दर्ज़ हैं जहाँ उसने दरिंदगी की सारी हदें लाँघ दी। कारगिल के सन्दर्भ में भी पाकिस्तान की बर्बरता के तीन बड़े उदाहरणों की बात की जाए तो वह हैं स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा, कैप्टन सौरभ कालिया और फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता, हालाँकि फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता वापस लौट आए थे। लेकिन क्या किया था पाकिस्तानी सैनिकों ने इनके साथ, इन अफसरों के साथ क्या हुआ था, पढ़िए पूरी दास्तान…….

पहले हीरो सौरभ कालिया

कैप्टन सौरभ कालिया (1976-1999) कारगिल में मई 1999 में नियंत्रण रेखा पर भारतीय सीमा के भीतर पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ के संबंध में रिपोर्ट करने वाले पहले सैन्य अधिकारी थे। उनको कारगिल का पहला हीरो भी कहा जाता है। कारगिल सेक्टर में 4-जाट रेजीमेंट में उनकी पहली पोस्टिंग थी। 15 मई, 1999 को वह अपने दल के पाँच जवानों अर्जुन राम, भँवर लाल बघेरिया, बीकाराम, मूलाराम और नरेश सिंह के साथ काकसर क्षेत्र में गश्त पर थे। इसी दौरान पाकिस्तानी सेना के साथ गोलीबारी में उनका गोला-बारूद खत्म हो गया। इससे पहले कि भारतीय सैनिक उन तक पहुँच पाते पाक रेंजरों ने उनको घेरकर युद्ध बंदी बना लिया।

22 दिनों तक उनको भयानक यातनाएँ देने के बाद गोली मार दी गई। 9 जून 1999 को पाकिस्तानी सेना ने सभी जवानों के क्षत-विक्षत शव भारत को सौंपे। इन्हें वीभत्स तरीके से टॉर्चर किया गया था। तीन हफ्ते बाद उनका क्षत-विक्षत शव सेना को मिला था। इतना टॉर्चर किया गया था कि उनकी पहचान तक मुश्किल थी। पाकिस्तानियों ने उनकी आँखें तक फोड़ दी थी और गला काट दिया था। पाक ने जब कैप्टन कालिया का शव सौंपा तो उनके शरीर के कई अंग कटे हुए और गायब थे। उनके दोनों कानों में गर्म छड़ें घुसेड़ दी गई थी। फिर भी, झूठे और मक्कार पाकिस्तान ने दावा किया था कि सौरभ का शव एक गड्ढे में मिला था और उनकी मौत ख़राब मौसम की वजह से हुई।

स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा

स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा जो विंग कमांडर अभिनंदन की तरह ही मिग-21 फाइटर जेट उड़ाते हुए पाकिस्तान सीमा में पहुँच गए थे। बात 27 मई 1999 की है। कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना ने ऑपरेशन ‘सफेद सागर’ लॉन्च किया था, जिसका मकसद एलओसी पर पाकिस्तानी सेना की स्थिति का पता लगाना था। वायुसेना की भटिंडा स्थित गोल्डन-एरोज स्क्वाड्रन में अजय आहूजा फ्लाइट कमांडर थे, सेना ने उन्हें जिम्मेदारी दी कि वह पाकिस्तानी सेना की सही स्थिति का पता लगाएं। वह मिग-21 लेकर निकले लेकिन बीच में ही उन्हें सूचना मिली कि फ्लाइट-लेफ्टिनेंट नचिकेता को अपना मिग-27 विमान आग लगने के कारण छोड़ना पड़ा है।

स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा

आहूजा को पता चल गया था कि नचिकेता पाकिस्तानी सीमा में हैं और वहाँ उन्हें ढूँढने जाना जोखिम भरा हो सकता है फिर भी वह अपने साथी का पता लगाने सीमा में घुस गए। जब वह नचिकेता की तलाश कर ही रहे थे कि बारूद गोला उनके जेट से टकराया जिससे उसमें आग लग गई। उन्हें पाकिस्तानी सीमा में उतरना पड़ा। 27 मई शाम साढ़े आठ बजे तक यह कंफर्म हो गया था कि अजय आहूजा शहीद हो चुके हैं। लेकिन, जब पाकिस्तानी सेना ने उनका शव सौंपा तो पता चला कि उनकी मौत प्लेन से कूदने की वजह से नहीं, बल्कि बहुत नज़दीक से गोली मारने से हुई थी। मरने से पहले उन्हें भी पाकिस्तानी सैनिकों ने टॉर्चर किया था। कारगिल युद्ध की समाप्ति के बाद स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा को उनकी बहादुरी के लिए मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया था।

8 दिन बाद लौटे फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता 

1999 में कारगिल युद्ध के दौरान फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता को पाकिस्तानी सेना ने बंदी बना लिया था। हालाँकि, भारत सरकार के कूटनीतिक प्रयासों और अंतरराष्ट्रीय दबावों के बाद उन्हें आठ दिन बाद छोड़ दिया गया था।

फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता

1999 में नचिकेता वायुसेना के नौवें स्क्वाड्रन जो कारगिल के बटालिक सेक्टर में है, पर तैनात थे। नचिकेता को 17 हजार फीट की ऊंचाई से 80 एमएम रॉकेट दागने की जिम्मेदारी दी गई थी। 27 मई के दिन भारतीय वायुसेना दुश्मन की चौकियों पर मिग-27 से लगातार हमले कर रही थी। लेकिन, एक रॉकेट के हमले में नचिकेता के विमान का इंजन बंद हो गया जिसकी वजह से उन्हें पाकिस्तानी सीमा में पैराशूट लेकर उतरना पड़ा। पाकिस्तानी सेना ने उन्हें बंदी बना लिया और रावलपिंडी जेल में असंख्य यातनाएँ दी। 8 दिन की यातनाओं के बाद 3 जून, 1999 को नचिकेता को पाकिस्तान में रेड क्रास को सौंप दिया गया और वह वाघा बार्डर के रास्ते भारत लौट आए। ग्रुप कैप्टन नचिकेता को वर्ष 2000 में वायुसेना पदक से सम्मानित किया गया था।

जेनेवा संधि का उलंघन

भारतीय सैनिकों के साथ अमानवीय तरीके से पेश आने के कारण 15 जून, 1999 को भारत ने पाकिस्तान को कारगिल युद्ध के दौरान युद्ध बंदियों के साथ जेनेवा संधि का हनन संबंधी नोटिस दिया। 1949 के इस अंतरराष्ट्रीय संधि के तहत युद्धबंदियों के साथ मानवतापूर्ण व्यवहार की शर्त रखी गई है। लेकिन पाकिस्तान न तब अपनी हरकतों से बाज आया था और न अब उससे सभ्य व्यवहार की उम्मीद की जा सकती है।

इंसाफ की आस

आज जहाँ देश कारगिल युद्ध के 20 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में देश एक बार फिर विजय दिवस मना रहा है वहीं 20 साल बाद भी इंसाफ न मिलने के कारण कारगिल युद्ध में शहीद कैप्टन सौरभ कालिया के परिजनों का दर्द रह-रह कर छलक उठता है। पाकिस्तान की अमानवीय यातनाओं से शहीद हुए कैप्टन सौरभ कालिया के परिजनों को आज तक इंसाफ नहीं मिला है। फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट में मामला चल रहा है।

न्याय की आस लगाए पिता डॉ. एनके कालिया और माता विजय कालिया का कहना है कि जब तक विदेश मंत्रालय पाकिस्तान या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह मामला सख्ती से नहीं उठाता, तब तक कुछ नहीं होने वाला। जिस तरह से भारत सरकार ने पाकिस्तान के साथ नौसेना अधिकारी कुलभूषण जाधव और विंग कमांडर अभिनंदन का मामला उठाया और उसके नतीजे भी सामने आए। लिहाजा, विदेश मंत्रालय को सौरभ कालिया का मामला भी पाकिस्तान और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सीधा उठाना चाहिए।

डॉ. कालिया का कहना है कि उस समय अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में यह मुद्दा सीधे पाकिस्तान या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठना चाहिए था। बाद में कॉन्ग्रेस के शासन काल में भी उन्हें न्याय नहीं मिला, लेकिन अब उन्हें मोदी सरकार से उम्मीदें हैं। पिता चाहते हैं कि उनके बेटे के मामले में इंसाफ मिलना चाहिए। भारत सरकार इस मामले में पाकिस्तान से माफी माँगने को भी कहे, क्योंकि इसमें युद्धबंदियों से संबंधित जेनेवा समझौते का उल्लंघन हुआ है।

धूर्त पाकिस्तान

“पाकिस्तान शायद यह भूल गया है कि 1971 में करीब 92 हजार सैनिकों के साथ आत्मसमर्पण को विवश हुआ था, लेकिन भारत ने बतौर युद्धबंदी उनकी सुख-सुविधा का पूरा ख्याल रखा था।” यह मैं इसलिए कह सकता हूँ क्योंकि मुझे उनके साथ बतौर गार्ड तैनात किया गया था। उनके लिए जबलपुर में ऑफिसर मेस का एक बड़ा हिस्सा खाली कराया गया था। उस ऐतिहासिक विजय के बाद भी भारतीय सेना की विनम्रता और संस्कारपूर्ण व्यवहार को याद करते हुए भारतीय सेना के सेवानिवृत्त कर्नल करतार सिंह ये बातें बड़े गर्व से कहते हैं। करतार सिंह सेना में उसी साल सैनिक के रूप में भर्ती होकर शकरगढ़ सेक्टर में युद्ध के मोर्चे पर तैनात थे।

इसका जिक्र यहाँ इसलिए क्योंकि 31 जुलाई 2013 को यू-ट्यूब पर एक वीडियो जारी हुआ, जिसमें एक पाकिस्तानी सैनिक गुल-ए-खांदन ने कैप्टन कालिया को मारने की बात कबूल की है। कांगड़ा के कोहाला गाँव में रहने वाले 59 वर्षीय करतार सिंह कहते हैं, “खुद पाकिस्तानी युद्धबंदी कह कर गए थे कि जितना सम्मान उन्हें भारत में बंदी होते हुए मिला, उतना तो सैनिक होते हुए पाकिस्तान में भी नहीं मिला। हम भले ही मांस खाते हों या नहीं, पाकिस्तानियों को ताजा मांस खिलाया गया था, उनकी सुविधाओं का ख्याल रखा गया, लेकिन सच यह भी है कि वे नहीं सुधरेंगे।”

कर्नल करतार के मुताबिक सीमा पर हमेशा जंग नहीं होती, दुश्मन से बातचीत भी होती है। लेकिन पाकिस्तानी इतने दगाबाज और धूर्त हैं कि कई बार बातचीत के लिए भारतीय सैनिक को बुलाया और गोली चला दी। पाकिस्तानी फौजी ने सौरभ कालिया के बारे में जो कहा है वह पाकिस्तान के झूठ को बेनकाब करता है। पाकिस्तान तो अक्सर अपने सैनिकों के शव भी लेने से यह कहकर इंकार कर देता है कि ये तो मुजाहिद्दीन हैं।

कर्नल करतार भारतीय सैनिकों के मानवतावादी दृष्टिकोण के बारे में बात करते हुए बताते हैं कि 1971 के युद्ध में पाकिस्तानी चौकियों पर कब्जा करने के बाद एक भारतीय सैनिक को दुश्मन के अस्त्र-शस्त्रों के बीच कुछ हिलता दिखाई दिया। कुछ ही देर में अंदर से एक पाकिस्तानी कैप्टन हाथ जोड़े हुए दिखाई पड़ा। उसका कहना था कि उसकी शादी को चार दिन ही हुए हैं। भारतीय सैनिक ने उसका हथियार रख लिया और उसे जाने दिया। इसके विपरीत कैप्टन सौरभ कालिया की टुकड़ी के साथ वे लोग इतनी बर्बरता और वीभत्सता से पेश आए। यही चरित्र है पाकिस्तान का।

पाकिस्तान की हरकतें कितनी घिनौने हो सकती हैं इसका देर-सवेर खुलासा हो ही जाता है। चाहे वह कारगिल हो या फिर कश्मीर में भारतीय सैनिकों के सिर काटने की घटना। सौरभ कालिया और अन्य भारतीय सैनिकों पर किए गए बर्बर अत्याचार को पाकिस्तान के सैनिकों ने कई बार स्वीकार किया है। हालाँकि, धूर्त पाकिस्तान ने आधिकारिक रूप से कभी यह स्वीकार नहीं किया कि कारगिल युद्ध में उसके सैनिक शामिल थे। लेकिन सच तो जगजाहिर है।