तिरंगे वाले हिजाब में हरे को ऊपर रखने के पीछे की मंशा क्या है?

नई दिल्ली। शाहीन बाग पर चल रहे मुस्लिम महिलाओं के प्रदर्शन को वामपंथियों, कट्टरपंथियों और तथाकथित बुद्धिजीवियों का पूरा समर्थन है। शायद इसलिए अब वहाँ पोस्टर्स के नाम पर आए दिन कुछ न कुछ विवादस्पद सृजनात्मकता का प्रदर्शन होता रहता है। अभी बीते दिनों वहाँ हिजाब में बिंदी वाली महिलाओं के पोस्टर लगे देखे गए थे। जिसके बाद लोगों ने कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओं महिलाओं को इस्लामिक वेशभूषा में देखकर उनकी मंशा पर सवाल उठाए थे और दावा किया था कि ऐसा करके ये लोग देश को इस्लामिक राष्ट्र बनाना चाहते हैं। अब इसी क्रम में सोशल मीडिया पर एक नया पोस्टर आया है।

इस नए पोस्टर में एक औरत है, जिसके माथे पर बिंदी की जगह अशोक चक्र है और जिसने हिजाब की जगह तिरंगा पहना है। अब इस तस्वीर में आपत्तिजनक ये है कि यहाँ इस तिरंगे को तिरंगे की तरह नहीं दर्शाया गया। बल्कि इसमें विशेष रूप से हरे रंग को उभारा गया। कुछ लोगों को लगेगा इसमें क्या आपत्ति हो सकती है? तिरंगा तो तिरंगा होता है। लेकिन नहीं। ऐसा सोचने वाले लोग वहीं लोग होंगे जो बढ़-चढ़कर हिंदू विरोधी नारे लगा रहे हैं, केंद्र सरकार द्वारा लाए कानून पर सवाल उठा रहे हैं। मुस्लिमों द्वारा निराधार आंदोलन को वाजिब ठहरा रहे हैं।

न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत के राष्ट्रीय ध्वज की छवि की मानक है। जिसे नर्सरी में पढ़ने वाला कोई भी बच्चा चित्रित कर कर सकता है।

हम अच्छे से जानते हैं कि राष्ट्रीय ध्वज में सबसे पहला रंग केसरिया होता है और आखिर हरा। तो फिर इस तस्वीर में हरे को ऊपर दिखाने के पीछे का क्या उद्देश्य है? ऐसे समय में जब लगातार मुस्लिमों द्वारा हिंदुओं की सभ्यता को तार-तार करने की कोशिश की जा रही हो, जब बिना किसी डर के हिंदू महिलाओं को इस्लामिक हिजाब में दिखाया जा रहा है, जब शैक्षिक संस्थानों की दीवारों पर ख़िलाफ़त 2.0 नजर जा रहा है। तेरा-मेरा रिश्ता क्या….ला इलाहा इल्लइल्लाह पूछा जा रहा है…उस समय ऐसी तस्वीरें लाने का क्या मतलब?? क्या उद्देश्य है हिंदुओं में पूजी जाने वाली काली माता को हिजाब में बाँधकर दर्शाने का? क्या कारण है हिन्दुओं के पवित्र प्रतीक स्वास्तिक को निस्तेनाबूद करने का?

हम सब जानते हैं तिरंगे के तीनों रंगों के अलग-अलग मायने हैं। केसरिया बलिदान का प्रतीक है, तो हरा खुशहाली का है। लेकिन हम ये भी जानते है कि इस्लाम में हरे रंग का बहुत महत्तव है और हिंदुओं में केसरिया का। इस लिहाज से अगर इस पोस्टर को देखा जाए तो पता चलेगा कि ये कोई गलती नहीं है या हरे के जरिए देश में खुशहाली लाने की बात नहीं हो रही। बल्कि इस देश को पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफ्गानिस्तान की तरह इस्लामिक राष्ट्र बनाने की पहल है। जिसके लिए पहले से चेतावनी दी जा रही है।

NationRevoParty@NationalRevolu

इस पोस्टर की माने तो और का विरोध करने वालो का मकसद साफ है? हिन्दू औरतों को बुरखे/हिजाब में पहुँचाना? और हिन्दुओ के पवित्र प्रतीक स्वास्तिक को निस्तेनाबूद करना? अब कुछ समझ आया?? मोदी CAA तो बहाना है असल मे कहीं और निशाना है..

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तिरंगे में समाहित रंगों की आड़ में संदेश दिया जा रहा है कि शाहीन बाग कोई आम प्रदर्शन नहीं है। ये वो प्रदर्शन हैं, जहाँ वेदना के नाम पर अपने मनसूबों को इस्लामिक ताकतों ने खुलेआम प्रदर्शित करना शुरू कर दिया है। यहाँ हरे रंग के जरिए, हिजाब के जरिए, जालीदार टोपियों के जरिए बताना शुरू कर हो चुका है कि उनके लिए महत्तवपूर्ण क्या है? औचित्य की लड़ाई को अब स्पष्ट तौर पर मजहबी लड़ाई बना दिया गया है… लेकिन फिर भी हम जैसे लोग ये कहने में लगे हुए हैं कि इतने लोगों की भीड़ गलत थोड़ी होगी… वाकई मोदी सरकार इनपर अत्याचार कर रही है।

सोशल मीडिया पर इस पोस्टर को लेकर कहा जा रहा है कि 1979 में पर्सिया में भी यही हुआ था। जहाँ पहले महिलाओं ने बहुत विरोध किया था लेकिन अंततः उन्हें हिजाब पहनना ही पड़ा। आज वो देश ईरान बन चुका है।

मुल्लो का बाप 😊@mullokabaap786

ये शाहीन बाग़ में लगाए हुए पोस्टर हैं । भारत को इस्लामिक राष्ट्र में बदलने का, हमारी मां बहनों को हिजाब पहनाने का।।1979 में पर्सिया में भी यही हुआ था। वहा पे महिलाओं ने बहुत विरोध किया था लेकिन अंततः उन्हें ये पहनना ही पड़ा। आज वो देश ईरान है।

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गौरतलब है कि नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ हुए विरोध प्रदर्शनों में बहुत से मुखौटे उतरे। हिंदू-मुसलमान भाईचारे की बात करते-करते हिंदुओं की सभ्यता को, उनकी परंपरा को, उनके धार्मिक चिह्नों को अपमानित किया गया। सोशल मीडिया पर इस बीच व्यापक स्तर पर मुहीम चली जहाँ हिंदुओं ने हिंदुओं को हिंदुओं के ख़िलाफ़ भड़काया।

इस बीच कई हिंदू घृणा से लबरेज पोस्टर दिखे (नीचे वीडियो में देखें), जिसके जरिए मुसलमानों के अधिकार और उनके मजहब को बाकियों से बड़ा और बेहतर बनाने की पूरी कोशिश हुई। प्रदर्शन में शामिल होने वाले विशेष समुदाय के पुरूष इस्लामिक टोपियों में नजर आए, जबकि अधिकांश मुस्लिम महिलाओं को बुर्के और हिजाब में देखा गया। जाहिर है, ये सब एक निश्चित समुदाय को उनके मजहब को उभारने के लिहाज से हुआ। ताकि एक बहुसंख्यक लेकिन धर्मनिरपेक्ष देश में इनका डर कायम हो सके।

जयन्ती मिश्रा