मुसलमानों ने सिर्फ हाथ काटा, चर्च ने तो जिंदगी तबाह कर दी, पत्नी ने कर ली आत्महत्या: एक प्रोफेसर की आपबीती

टीजे जोसेफ केरल के इदुकी जिले के एक कॉलेज में मलयालम पढ़ाते थे। 4 जुलाई 2010 को ईशनिंदा के आरोप में मुस्लिम कट्टरपंथियों ने उनका दाहिना हाथ काट दिया। कट्टरपंथी मुस्लिम संगठन के 7 युवकों ने ​उन पर तब हमला किया जब वे अपने परिवार के साथ चर्च से प्रार्थना कर लौट रहे थे। कट्टरपंथियों का आरोप था कि जोसेफ ने परीक्षा के लिए जो प्रश्न तैयार किए थे उसमें ईशनिंदा वाले सवाल पूछे गए थे।

इस हमले के बाद जोसेफ का जीवन सामान्य नहीं रह गया था। हाल ही में जोसेफ की ऑटोबायोग्राफी रिलीज हुई है। इसके बाद एक फिर से धार्मिक असहिष्णुता कि मुद्दा गर्म हो गया। इसका कारण उन्हें निशाना बनाने वाले इस्लामिक कट्टरपंथी नहीं हैं। बल्कि, जोसेफ के खुद के ईसाई समुदाय ने उनकी जिंदगी तबाह कर दी। बकौल जोसेफ, उन्होंने अपना हाथ अपनी समुदाय की वजह से खोया है।

जोसेफ ने अपनी पुस्तक के विमोचन के बाद एक साक्षात्कार में कहा, “इस्लामिक कट्टरपंथियों ने तो मुझ पर एक बार हमला किया। मगर जिस ईसाई संप्रदाय से मेरा संबंध है, उसने मुझे बहिष्कृत करके मेरा जीवन बर्बाद कर दिया। बिना किसी उचित कारण के मुझे नौकरी से निकाल दिया। मेरी नौकरी छूटने के कारण हुए सामाजिक अलगाव और आर्थिक संकट से तंग आकर मेरी पत्नी ने आत्महत्या कर ली।”

खुद को ‘ईसाई कट्टरता का जीवित शहीद’ बताते हुए 63 वर्षीय जोसेफ ने चर्च पर आरोप लगाया कि उसने मुस्लिम समूहों के साथ सीधे टकराव से बचने के लिए उन्हें बलि का बकरा बनाया। बता दें कि जोसेफ द्वारा सेट किए गए पेपर पर विवाद बढ़ने के बाद वो गिरफ्तारी के डर से अंडरग्राउंड हो गए थे। पुलिस ने उनके खिलाफ सांप्रदायिक घृणा फैलाने का मामला दर्ज कर लिया था। बचने के लिए जोसेफ एक शहर से दूसरे शहर भाग रहे थे। आखिरकार उन्हें पलक्कड़ जिले में एक मुस्लिम के लॉज में आसरा मिला। 1 अप्रैल 2010 को उन्हें यहाँ से गिरफ्तार कर लिया गया। कुछ समय बाद ही जोसेफ जमानत पर रिहा हो गए थे, लेकिन उनके पास नौकरी नहीं थी। उसी साल मार्च में उन्हें जॉब से सस्पेंड कर दिया गया। जोसेफ बताते हैं कि वो तीन बार हमले से बच गए, लेकिन चौथी बार हमलावरों ने उनका हाथ काट दिया।

जोसेफ कहते हैं, “शुरुआत में जब प्रश्न को लेकर विवाद हुआ तो साइरो मालाबार चर्च और इसके तहत आने वाले कॉलेज मैनेजमेंट ने मेरा पूर्ण समर्थन दिया था। हालाँकि मार्च 2010 में ही केरल में चर्च के अधिकारियों की एक दूसरी हाई-लेवल मीटिंग हुई थी। इसके बाद हर किसी ने अपना स्टैंड बदल लिया। इस बैठक में PFI और अन्य कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों का विरोध नहीं करने का निर्णय लिया गया। इसके बाद मैं बिल्कुल अकेला रह गया।” उन्होंने आगे कहा, “चर्च ने इस्लामी कट्टरवाद और मेरे साथ हुए हमले का समर्थन किया, जिसकी वजह से PFI ने मुझ पर हमला किया और मुझे अपने हाथ गँवाने पड़े।”

हमले में अपना दाहिना हाथ खोने के बाद उन्होंने बाएँ हाथ से पुस्तक लिखी। जोसेफ ने बताया कि चर्च ने शुरुआत में समर्थन करने के बाद उन्हें बहिष्कृत कर दिया। इसका साफ मतलब था कि चर्च ने आधिकारिक तौर पर यह घोषित कर दिया कि वो अब इसके सदस्य नहीं रहे। उनके साथ-साथ उनकी पत्नी, दो बच्चे और बुजुर्ग माँ को भी बहिष्कृत कर हाशिए पर खड़ा कर दिया।

जोसेफ कहते हैं, “चर्च के अधिकारियों ने मुझे इस्लामोफोबिया के साथ एक आतंकवादी के रूप में दिखाने का प्रयास किया। उन्होंने मुझे बहिष्कृत किया और पादरियों और धर्मात्माओं को मेरे पास आने और किसी भी प्रकार की मदद करने से रोका। यहीं से तकलीफें शुरू हुईं, जो अभी भी मेरे जीवन को प्रभावित कर रहा है।” वो कहते हैं, “चर्च के फैसले की वजह से मेरे बच्चों ने अपनी माँ को खो दिया। अब वो कभी वापस नहीं आएगी।”

उन्होंने आगे कहा, “मुस्लिम संगठन ने मेरे ऊपर हमला किया, लेकिन मेरे अपने लोगों ने मुझे जॉब से निकाल दिया, मेरे परिवार को बहिष्कृत कर दिया। चर्च और कॉलेज ने जो मेरे साथ किया वो कट्टरपंथियो के किए से भी भयानक सजा है।”

एकेडमिक और लेखक शाजी जैकब का कहना है कि जोसेफ के हाथ काट दिए जाने और फिर उनकी पत्नी द्वारा आत्महत्या कर लिए जाने के बाद से ही केरल में मजहबी कट्टरवाद अत्यंत चिंता का विषय बनकर उभरा। उन्होंने कहा, “अब उनकी (टीजे जोसेफ की) आत्मकथा साबित करती है कि कोई भी धार्मिक समूह असहिष्णुता और रुढिवादिता से मुक्त नहीं है। कैथोलिक चर्च ने अदालतों द्वारा उन्हें ईशनिंदा के आरोप से मुक्त करने के बाद भी उनके साथ बुरा व्यवहार किया है।”