धारा 370 : कश्‍मीर में पत्थर बरसाने वाले हाथों में गिटार और आजादी के नारों के बजाय गूंज रहा सूफी कलाम

श्रीनगर। कश्मीर में इस बार पहाड़ों पर पड़ी बर्फ ही नहीं पिघल रही बल्कि निराशा, हताशा, अवसाद और तनाव का दौर भी बीत रहा है। तभी तो पत्थर बरसाने वाले हाथों में गिटार और आजादी के नारों के बजाय सूफी कलाम गूंज रहा है। किसी को भी यह जानकार हैरत होगी कि कश्मीर में इस समय 150 से ज्यादा छोटे-बड़े रॉक बैंड हैं। इनके अलावा कई नौजवान बिना बैंड ग्रुप के भी विभिन्न प्रतियोगितओं में हिस्सा ले रहे हैं। खेलों के साथ गीत-संगीत में कश्मीर के युवाओं की इस दीवानगी को सेना, पुलिस व सीआरपीएफ ने पहचाना और एक मंच देकर नए कश्मीर की नींव रख दी।

चिनार यूथ कम सूफी फेस्टिवल का आयोजन

संगीत की ऐसी कोई विधा नहीं जो कश्मीर के युवाओं से अछूती हो। दो दिन पहले ही डल झील के किनारे स्थित शेरे कश्मीर इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर में सेना की ओर से चिनार यूथ कम सूफी फेस्टिवल का आयोजन किया गया। इसमें बैटल ऑफ बैंड्स संगीत प्रतियोगिता करवाई गई, जिसमें घाटी के 30 से ज्यादा रॉक बैंडस ने हिस्सा लिया। इनमें लड़कियों का एक बैंड रुदाद भी शामिल था। समारोह के समापन पर नूरां सिस्टर्स ने प्रस्तुति दी। नूरां सिस्टर्स ने खुद एक बातचीत में कहा कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि कश्मीर में उन्हें इतना अच्छा रिस्पांस मिलेगा।

गीत-संगीत किसी भी माहौल को बदल सकता है : ढिल्लो

चिनार कोर के निवर्तमान कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल केजेएस ढिल्लो ने कहा कि हमने कश्मीर में पथराव और आतंकी ¨हसा में लिप्त कई युवाओं की काउंसलिंग के दौरान पाया कि इन्हें खुद को व्यक्त करने का एक सही मंच चाहिए। गीत-संगीत को भी एक माध्यम बनाने का प्रयास किया। खेलकूद और गीत-संगीत किसी भी जगह के माहौल को बदल सकता है।

पुलिस ने शुरू कर रखा है ‘छूना है आस्मां’ : दिलबाग सिंह

पुलिस महानिदेशक दिलबाग सिंह ने कहा कि कश्मीर का सूफी संगीत शुरू से ही बहुत मशहूर रहा है। पुलिस ने स्थानीय प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने के लिए ही ‘छूना है आस्मां’ जैसा कार्यक्रम शुरू कर रखा है।

बदलाव कुदरत के निजाम का अहम हिस्सा : अदनान मोहम्मद

ब्लड रॉक्ज बैंड ग्रुप के संस्थापक अदनान मोहम्मद ने कहा कि यहां के युवा यहां के चुनौतियों से अच्छी तरह वाकिफ हैं। इसलिए ज्यादातर बैंड्स सार्वजनिक प्रस्तुतियों में सूफी रॉक ही गाते बजाते हैं। आप किसी की मानसिकता नहीं बदल सकते, लेकिन बदलाव तो कुदरत के निजाम का एक अहम हिस्सा है।

गीत-संगीत को मजहब के साथ न जोड़ें : जाहिद वानी

जाहिद वानी नामक एक युवक ने कहा कि कई लोग गीत-संगीत को मजहब के साथ जोड़ देते हैं, ऐसा नहीं होना चाहिए। दो दिन पहले मैं एसकेआइसीसी में था, मैंने वहां कई ऐसे लड़कों को देखा है जो यहां कई बार पत्थरबाजी के मामलों में पकड़े जा चुके हैं, उनमें से कई गिटार बजा रहे थे तो कुछ गाना गा रहे थे।