‘2013 से अन्वय नाइक वित्तीय संकट में थे, अर्णब ने आत्महत्या के लिए नहीं उकसाया’: जानिए क्या कहती है 2019 की क्लोजर रिपोर्ट

महाराष्ट्र सरकार के इशारे पर रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी के खिलाफ ‘विच हंट’ में जुटी मुंबई पुलिस को 2019 में अन्वय नाइक आत्महत्या मामले में दायर क्लोजर रिपोर्ट कठघरे में खड़ा करती है।

केस का बैकग्राउंड

यह मामला इंटीरियर डिजाइनर अन्वय नाइक की मृत्यु से संबंधित है, जिसने मई 2018 में आत्महत्या कर ली और अपने पीछे एक सुसाइड नोट छोड़ गया। इस सुसाइड नोट में आरोप लगाया गया कि अर्णब गोस्वामी ने उनका ₹83 लाख का बकाया नहीं चुकाया। सुसाइड नोट में दो अन्य लोगों- फिरोज शेख और नितेश सारडा का भी नाम था। उन दोनों पर क्रमश: ₹4 करोड़ और 55 लाख न चुकाने का आरोप लगाया। यहाँ पर यह ध्यान देना उचित है कि मामला अप्रैल 2019 में बंद कर दिया गया था और अब अर्नब गोस्वामी को चुप कराने के लिए पुलिस द्वारा एकतरफा रूप से खोला गया है।

द इंडियन एक्सप्रेस की एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के अनुसार, अन्वय नाइक आत्महत्या मामले की जाँच कर रहे अधिकारियों को रिपब्लिक टीवी के संपादक अर्णब गोस्वामी, नितेश सारडा और फिरोज शेख के बीच कोई संबंध नहीं मिला। उन्हें कोई सबूत नहीं मिला जो यह सत्यापित कर सके कि तीनों ने नाइक का जीवन ‘असहनीय’ बनाया या आत्महत्या के लिए प्रेरित किया। इस प्रकार, मामले की जाँच कर रही रायगढ़ पुलिस ने अप्रैल 2019 में मजिस्ट्रेट के सामने अपनी क्लोजर रिपोर्ट में ‘case summary’ दायर किया था। यह उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि आरोपित के खिलाफ पर्याप्त सबूत के अभाव में ‘summary’ दायर किया गया। जिससे पुलिस को आरोप पत्र प्रस्तुत करने से रोका जा सके।

अर्णब गोस्वामी और अन्य आरोपितों के बीच कोई संबंध नहीं है

क्लोजर रिपोर्ट में जोर देकर कहा गया, “तीनों अभियुक्तों को विभिन्न क्षेत्रों, स्थानों और तीनों के बीच कोई संबंध नहीं होने के कारण जाँच में प्रमाणित किया गया है। अब तक की जाँच में इस बात का कोई सबूत नहीं मिला है कि सुसाइड नोट में नामजद तीन आरोपितों की ओर से की गई कार्रवाई, व्यक्तिगत रूप से या एक साथ मिलकर, मृतक के जीवन को असहनीय बना दिया या उसके पास आत्महत्या करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। इसलिए, इस मामले में साक्ष्य के अभाव में, ‘अंतिम सारांश’ को स्वीकार किया जाना चाहिए।”

अन्वय नाइक की कंपनी भारी घाटे में थी

इसमें आगे कहा गया, “जाँच से पता चला कि पिछले छह से सात वर्षों (2018 से पहले), कॉनकॉर्ड (अन्वय नाइक की कंपनी) को वित्तीय नुकसान हो रहा है, जिसके कारण अन्वय नाइक और उनकी माँ मानसिक तनाव में थे। चूँकि उनकी माँ कंपनी में भागीदार थीं, इसलिए उन्होंने उनकी गला दबाकर हत्या कर दी, और फिर खुद को लटका दिया। ऐसा उन्होंने सुसाइड नोट में लिखा।”

क्लोजर रिपोर्ट में दोहराया गया है कि कॉनकॉर्ड डिज़ाइन्स प्राइवेट लिमिटेड ने कई ग्राहकों के काम को अधूरा छोड़ दिया था, जिनमें से अन्वय नाइक का नाम भी शामिल था। सुसाइड नोट में इसका जिक्र किया गया था। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया, “आरोपितों ने पुलिस के सामने पेश किए गए दस्तावेजों के अनुसार वेंडरों और विक्रेताओं को भुगतान किया।” रायगढ़ पुलिस द्वारा प्रस्तुत क्लोजर रिपोर्ट को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट एल जी पच्ची ने 16 अप्रैल, 2019 को स्वीकार कर लिया।

इंडियन एक्सप्रेस ने विशेष रूप से कॉनकॉर्ड ऑफ कंपनीज के साथ कॉनकॉर्ड द्वारा दायर वार्षिक वैधानिक रिटर्न को एक्सेस किया। विवरण के अनुसार, कंपनी पर वित्तीय वर्ष 2016 में ₹26.5 करोड़ का कर्ज था। दिलचस्प बात यह है कि कंपनी जल्द ही निष्क्रिय हो गई और उस वर्ष के बाद से उसने वार्षिक रिटर्न दाखिल करना भी बंद कर दिया।

अन्वय नाइक के परिवार द्वारा लगाया गया आरोप

जब अदालत के समक्ष क्लोजर रिपोर्ट पेश की गई, तो पीड़ित परिवार का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील वैभव कार्णिक ने आरोप लगाया था कि पुलिस द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों की सत्यता संदिग्ध थी। उन्होंने दावा किया, “पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट कई दस्तावेजों पर आधारित थी जैसे कि अभियुक्तों द्वारा जमा किए गए डेबिट नोट, जिनकी गिनती भी नहीं की गई थी और इसलिए, उनकी सत्यता संदिग्ध है।”

अन्वय नाइक की बेटी अदन्या नाइक ने भी दावा किया था कि अर्णब गोस्वामी और अन्य आरोपित एक-दूसरे को जानते थे। उसने आरोप लगाया, “जब मेरे पिता फिरोज शेख को भुगतान करने के लिए कहा, तो उन्होंने कहा कि गोस्वामी ने भी भुगतान नहीं किया है। उसे कैसे पता चला कि भुगतान किसने किया था? इसका मतलब है कि वे एक दूसरे से जुड़े हुए थे।” उसने यह भी दावा किया कि इस मामले की जाँच करने वाले इंस्पेक्टर सुरेश एच वरडे ने मामले को ‘अविश्वसनीय’ बनाना चाहा और शिकायत वापस लेते हुए उन्हें एक बयान पर हस्ताक्षर करने के लिए धमकाया।

इस मामले में मई में मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख द्वारा अवैध रूप से फिर से जाँच का निर्देश देने के बाद पीड़ित की पत्नी अक्षत नाइक ने 12 अक्टूबर को मामले को फिर से खोलने के लिए 35 कारण प्रस्तुत किए थे।

जाँच अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई

इस बीच, मुंबई पुलिस ने इंस्पेक्टर सुरेश एच वरडे के खिलाफ विभागीय जाँच शुरू की थी, ताकि मामले के तथ्यों को मिटा दिया जाए। उन्हें निरीक्षक के पद से जिला यातायात विभाग में स्थानांतरित कर दिया गया। पीड़िता के परिवार ने आरोप लगाया था कि ट्रैफिक विभाग में उनके स्थानांतरण के बावजूद वाडारे ने मामले की जाँच जारी रखी। अक्षत नाइक ने आगे आरोप लगाया कि अर्णब गोस्वामी ने अपने केबिन में मुंबई के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को अपना बयान दिया था और जाँच रिपोर्ट में उसका कोई उल्लेख नहीं है।

अर्णब गोस्वामी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया

इससे पहले, अलीबाग अदालत ने अर्णब गोस्वामी की 14 दिनों की पुलिस हिरासत की माँग को लेकर मुंबई पुलिस की याचिका खारिज कर दी थी, जिसे 4 नवंबर को गिरफ्तार किया गया था। आधी रात को चली सुनवाई के बाद, अलीबाग कोर्ट ने रिपब्लिक टीवी एडिटर-इन-चीफ को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया।

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट सुनैना पिंगले ने कहा था कि पुलिस मृतक और गोस्वामी के बीच प्रथम दृष्टया लिंक स्थापित करने में विफल रही है। CJM ने माना, “आरोपित व्यक्तियों की गिरफ्तारी के पीछे के कारणों और आरोपित व्यक्तियों द्वारा दी गई दलीलों को ध्यान में रखते हुए, गिरफ्तारी प्रथम दृष्टया अवैध लगता है। कोई भी ठोस सबूत प्रस्तुत नहीं किया गया है जो इस अदालत को गिरफ़्तार अभियुक्तों को पुलिस हिरासत में भेजने के लिए वारंट देता हो।”

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