Makar Sankranti 2019: भीष्म ने खुद की मौत के लिए चुना था यह दिन, जानें और भी पौराणिक किस्से

मकर संक्रांति का त्योहार हिन्दुओं में बहुत ही श्रद्धा और धूमधाम के साथ मनाया जाता है. जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है तो इसे मकर संक्रांति कहते हैं. संक्रांति सूर्य के उत्तरायण काल का प्रारंभिक दिन है इसलिए इस दिन पवित्र नदी में किया स्नान किया जाता है. इस दिन दान देना बहुत फलदायी होता है. मकर संक्रांति के दिन स्नान, दान, तप का एक विशेष महत्व है. मकर संक्रांति हिंदुओं का प्रमुख पर्व है जिसे संपूर्ण भारत और नेपाल में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है. मकर संक्रांति के दिन से ही सूर्य उत्तरायण की ओर गति करता है इसलिए इस पर्व को उत्तरायणी भी कहते हैं.

क्या है इतिहास
ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक मकर से मतलब मकर राशि से और संक्रांति का संबंध परिवर्तन से है. जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है तो इसे मकर संक्रांति कहते हैं. संक्रांति उत्तरायण काल का प्रारंभिक दिन है इसलिए इस दिन पवित्र नदी में किया स्नानकिया जाता है. कहते हैं इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने से संक्रमण का खतरा कम होता है. वहीं इस दिन किए दान का फल कई जन्मों तक मिलता रहता है.

वहीं पुराणों के मुताबिक शनि महाराज का अपने पिता से वैर भाव था क्योंकि सूर्य देव ने उनकी माता छाया को अपनी दूसरी पत्नी संज्ञा के पुत्र यमराज से भेद-भाव करते देख लिया था, इस बात से नाराज सूर्य भगवान ने संज्ञा और पुत्र को अपने से अलग कर दिया था. इससे क्रोधित होकर छाया और शनि ने सूर्य देव को कुष्ठ रोग का शाप दे दिया था, जिसके बाद 6 माह के बाद इसी दिन सूर्य देव को इस शाप से मुक्ति मिली थी. जिसके बाद से इस दिन को संक्रमण से मुक्ति का दिन भी माना जाने लगा.

भीष्म पितामह ने मृत्यु के लिए चुना था आज का दिन

हिंदू ग्रंथों में इस दिन का विशेष महत्व है. भीष्म पितामह ने मृतक शैय्या पर लेटे हुए इसी दिन को अपने प्राण त्यागने के लिए चुना था. ऐसा विश्वास किया जाता है कि जो व्यक्ति उत्तरायण की अवधि में मृत्यु को प्राप्त करता है वह जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति मिल जाती है. गीता के अनुसार जो व्यक्ति उत्तरायण में शरीर का त्याग करता है वह श्री कृष्ण के परम धाम में वास करता है.

पिता-पुत्र संबंध के लिए विशेष दिन

पुराणों के अनुसार इस दिन सूर्य भगवान एक पिता के रूप में  अपने पुत्र शनि से मिलने जाते हैं और वह वहां पर एक माह निवास भी करते हैं, इसलिए इस दिन को पिता पुत्र के संबंध के लिए विशेष माना जाता है.

संक्रांति पर पतंग उड़ाने का इतिहास
मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने को लोग धार्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मानते हैं. पतंग उड़ाने  की प्रचलित कथाओं के अनुसार मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की परंपरा की शुरुआत भगवान ने थी. त्रेतायुग में भगवान श्री राम ने मकर संक्रांति के दिन ही अपने भाइयों और श्री हनुमान के साथ पतंग उड़ाई थी, इसलिए तब से यह परंपरा पूरी दुनिया में प्रचलित हो गई। प्राचीन भारतीय साहित्य और धार्मिक ग्रंथों में भी पतंगबाजी का काफी उल्लेख मिलता है ऐसा कहा जाता है कि जब भगवान राम ने पहली बार इस त्योहार में पतंग उड़ाई थी तो वह पतंग इंद्रलोक में चली गई थी. भगवान राम की इस परंपरा को लोग आज भी श्रद्धा भाव के साथ मनाते हैं. भारत देश में लोग पतंग उड़ाने को शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मानते हैं. पतंग उड़ाने से कई सारे शारीरिक व्यायाम होते हैं जिससे शरीर पूरी तरह से स्वस्थ रहता है.

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