कोटा: जगह की कमी के कारण घर में ही अंतिम संस्कार करने को मजबूर है यह संप्रदाय

कोटा। राजस्थान के नाथ संप्रदाय के लोग अपनी एक परंपरा के चलते घर में ही अंतिम संस्कार करने को मजबूर हैं. यह खबर समाज के एक अलग ही पहलू को पेश करती है, लेकिन राजस्थान के नाथ संप्रदाय के लोगों को मुक्तिधामों में समाधी बनाने की जगह न मिलने के कारण उन्हें घर में ही अंतिम संस्कार करना पड़ता है.

दरअसल, नाथ संप्रदाय में मौत के बाद समाधि देने की पंरपरा है, लेकिन मुक्तिधामों में उन्हें समाधी बनाने नहीं दी जाती है. कई लोग इसका विरोध करते हैं. जिस वजह से ये लोग अपने ही घर में समाधी बनाने को मजबूर हैं. लाडपुरा के कर्बला इलाके में रहने वाले दयाशंकर योगी की मौत वर्ष 2010 में हुई थी. उनकी मौत के बाद जब कहीं और उन्हें दफन करने की जगह नहीं मिली तो परिजनों ने उनका अंतिम संस्कार अपने ही घर के आंगन में करते हुए समाधी बना दी.

वहीं, समाज के एक अन्य परिवार की घर के अंदर एक खुले हिस्से में दादा-दादी और एक तरफ उनके पूर्वजों की समाधी बनी हुई है. जब इनकी मौत हुई तो परिजनों ने अपने घर में ही इनका अंतिम संस्कार कर दिया और इन्हें घर के अंदर ही समाधी दे दी. समाधियों के ऊपर शिवलिंग की स्थापना की गई है. नाथ संप्रदाय के लोग शिव के उपासक माने जाते हैं और इसलिए उनकी समाधियों पर शिव परिवार की स्थापना करने की मान्यता है. कोटा में नाथ समाज के लगभग प्रत्येक घर में पूर्वजों की ऐसी समाधियां देखी जा सकती हैं. जिन घरों में जगह नहीं उनमें तो कमरों तक में ये समाधियां बनाई गईं है.

कुन्हाड़ी, लाडपुरा और बोरखेड़ा इलाके में इन योगी समाज के लोगों की ऐसी कई समाधियां है जो घरों में है. घर में अंतिम संस्कार करने पर इलाके के लोगों का प्रतिशोध भी इस समाज के लोगों द्वारा झेलना पड़ता है. मौहल्ले के लोग घर में मुर्दे को दफन करने का विरोध करते हैं. कई बार हालात झगड़े तक पहुंच जाते हैं लेकिन समाज के इन लोगों को उस वक्‍त पीड़ा का दोहरा दंश झेलना पड़ता है, लेकिन नाथ संप्रदाय के लोगों की ये मजबूरी ही कही जा सकती है.

परेशान होकर कई लोग कर चुके हैं धर्म परिवर्तन
साथ ही योगी समाज के लोगों की कोटा में 50 हजार जनसंख्या है. ऐसे में इन्हें आने वाले वख्त की चिंता भी सताती है. ये घटना विकास की इबारत लिखने का दावा करने वाली तमाम सरकारों को शर्मसार कर देने वाली है. भारत जिसे संस्कृति प्रधान देश माना जाता है. एसे देश में एक समाज इतने हाशिये पर है की मौत के बाद भी दो गज जमीन के अपने हक के लिए संघर्ष कर रहा है और अपने धर्म से दूर होने को मजबूर है.

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