….. तो क्या अलग-अलग थानों में FIR का पैटर्न पहले से बना कर उपलब्ध करा दिया गया है

उत्तर प्रदेश पुलिस की इस ‘अनोखी कार्यशैली’ को अंग्रेजी दैनिक अखबार ‘द इंडियन एक्प्रेस’ के 21 अगस्त के अंक में ’21 डेथ्स, 20 सिमिलर एफआईआर्स, सेम कीवर्ड्स’ शीर्षक के तहत विस्तार से प्रकाशित किया गया है

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में इससे पहले शायद ऐसा कभी हुआ होगा कि अलग-अलग समय पर अलग-अलग जगह हुईं मुठभेड़ों में मारे गये अपराधियों के मामलों में एफआईआर एक जैसी दर्ज की गई हो और उसमें शामिल विशिष्ट शब्द तक एक जैसे प्रयोग किये गये हों। हर किसी को चौंका देने वाले, सोचने को विवश कर देने वाले इस आश्चर्यजनक पुलिसिया कदम से ऐसा प्रतीत होता है मानो उच्च स्तर पर एफआईआर दर्ज करने का एक सेट पैटर्न बनाया गया हो और उसे थानों को इस निर्देश के साथ उपलब्ध कराया गया हो कि यदि उनके क्षेत्र में कोई बदमाश मुठभेड़ में ढेर किया जाए, तो इसी पैटर्न के अनुरूप एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए।

उत्तर प्रदेश पुलिस की इस ‘अनोखी कार्यशैली’ को अंग्रेजी दैनिक अखबार ‘द इंडियन एक्प्रेस’ के 21 अगस्त के अंक में ’21 डेथ्स, 20 सिमिलर एफआईआर्स, सेम कीवर्ड्स’ शीर्षक के तहत विस्तार से प्रकाशित किया गया है। अखबार ने मार्च, 2017 यानी योगी आदित्यनाथ सरकार के सत्तासीन होने से लेकर 4 अगस्त, 2018 के बीच 24 जिलों में हुईं गोलीबारी की 2,351 वारदातों के दौरान मुठभेड़ों में मार गिराये गये 63 अपराधियों में से 41 के मामलों की पड़ताल के क्रम में उन 21 मौतों का जिक्र किया है, जिनका व्यौरा 20 एफआईआर में एक जैसा दर्ज है।

काबिलेजिक्र है कि भाजपा नीत योगी आदित्यनाथ सरकार के शुरुआती कार्यकाल में पुलिस को मिली भरपूर सफलता के आधार पर ही खुद मुख्यमंत्री सरकार का बखान करते रहे हैं कि उनकी सरकार ने प्रदेश को अपराध और अपराधियों से मुक्त कर दिया है। बहरहाल, पड़ताल के क्रम में बाकी के 21 मामलों में किस स्टाइल में एफआईआर दर्ज की गई हैं, पर से पर्दा इसलिए नहीं उठ सका, क्योंकि या तो मारे गये लोगों के परिजनों को एफआईआर की कॉपी उपलब्ध नहीं हो सकी, या फिर उनके परिजन कहीं और चले गये हैं, जिन्हें खोजा नहीं जा सका, या फिर मौजूदा सम्बंधित पुलिस अफसरों ने डिटेल्स देने से मना कर दिया, या उनके द्वारा कहा गया कि वे अमुक के बारे में नहीं जानते, क्योंकि उनकी नई तैनाती है। हकीकत जो भी हो, सरकार द्वारा अपराध मुक्त राज्य की वाहवाही और विपक्षी दलों द्वारा मुठभेड़ों पर सवाल खड़े करते रहने के बीच, यह भी उल्लेखनीय है कि इसी साल मई में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने योगी सरकार को निर्देश दिया था कि वह इन मामलों में से 17 मामलों की जांच के लिए पांच सदस्यीय टीम का गठन कर इनकी जांच कराये। मुठभेड़ों का मामला इसी जुलाई में तब और सुर्खी बन गया था जब सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश सरकार को इस सिलसिले में नोटिस जारी किया था।

इन 20 एफआईआर में दर्ज शब्दों की पुनरावृत्ति में जाएं, तो पता चलता है कि 12 एफआईआर में अपराधियों की सूचना ‘इनफार्मर’ (मुखबिर) से मिलती है। क्रिमिनल ‘मोटरसाइकिल’ से आते हैं। इनमें से अधिकांश क्रिमिनल्स की बाइक फिसलती है, वे गिरते हैं और गोली चलाते हैं। 11 एफआईआर में पुलिस ने लिखा है, उसने ‘सिखलाये गये तरीके’ या ‘ट्रेनिंग’ या फिर ‘फील्डक्राफ्ट’ के मुताबिक कार्रवाई की। 18 एफआईआर में ‘अदम्य साहस’ का प्रयोग किया गया है। 16 एफआईआर में जहां ‘जान की परवाह किये बिना’ कार्रवाई की बात कही गई है, वहीं 9 में ‘बुलेट प्रूफ जैकेट’ से गोली के टकराने का उल्लेख है। इसी तरह 8 एफआईआर में ‘सर्वोच्च न्यायालय के आदेश और राष्ट्रीय मानवाधिकार काउंसिल के दिशानिर्देश’ के पालन का उल्लेख है। 12 एफआईआर में पुलिस ने लिखा है कि ‘रात या बेवक्त’ की वजह से या फिर ‘भयवश’ उसे चश्मदीद नहीं मिले। 18 एफआईआर में अपराधियों के मारे जाने का जिक्र है, जबकि उनके सहयोगियों के ‘भाग निकलने’ का जिक्र है। इन सभी एफआईआर में मुठभेड़ का समय रात या फिर अलसुबह दर्ज है। यह भी जिक्र है कि बंदे को ‘टॉर्चलाइट’ के जरिए स्पॉट किया गया। साथ ही यह भी लिखा गया है कि फायरिंग ‘आत्मरक्षार्थ’ या ‘न्यूनतम’ की गई।

मुठभेड़ों में अपराधियों की मौत शरीर के किस अंग में गोली लगने से हुई, यह जानने के लिए न्यूजपेपर ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट का सहारा लिया। हालांकि 41 मामलों में से उसे 16 पोस्टमार्टम रिपोट्र्स ही हासिल हो सकीं। इन 16 में 3 को गोली सिर में, 8 को सीने में, जबकि 5 को कई गोलियां लगीं। 3 अगस्त, 2017 को आजमगढ़ में मारे गये जय हिंद यादव को, तो 19 गोलियां लगी थीं। एफआईआर में कॉमन शब्दों के बारे में विभिन्न स्तर पर ली गई प्रतिक्रिया के क्रम में उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह की प्रतिक्रिया भी शामिल है। उन्होंने कहा है कि एफआईआर्स में कुछ बेसिक कॉमन वड्र्स हैं, लेकिन ‘भाषा और तथ्य सभी मुठभेड़ों में कॉमन नहीं होने चाहिए। एफआईआर लिखते वक्त सावधानी बरतने की जरूरत है।’ एफआईआर्स में सिमिलर्टीज के सवाल पर मौजूदा डीजीपी ओपी सिंह का कहना है, ‘कोई सेट पैटर्न नहीं है। स्पॉट पर सिचुएशन के मुताबिक ही एफआईआर्स दर्ज की गई हैं।’

गौतम बुद्ध नगर के मौजूदा एसएसपी अजय पाल शर्मा, इससे पहले जब शामली में एसपी थे, तो वहां पांच मुठभेड़ों में छह अपराधी मार गिराये गये थे। इसीलिए लोग उन्हें ‘एनकाउंटर मैन’ भी कहते हैं। इसी वजह से प्रोन्नत होकर एसएसपी बने शर्मा के आने के बाद गौतम बुद्ध नगर में भी मुठभेड़ों में दो और अपराधी मार गिराये गये। एफआईआर्स में कॉमन शब्दों के बारे में उनका मत है, ‘कुछ चीजें ऐसी हैं जो निश्चित रूप से सभी एफआईआर में आएंगी।…स्पॉट पर जो होता है, उसे हम शामिल करते हैं। अपराधी जब फायरिंग करते हैं, पुलिस बुलेट को फेस कर रही हो या नहीं, हम एफआईआर में ब्रेवरी (बहादुरी), तो मेंशन करेंगे ही।’ साथ ही कहा वे, ‘उन अपराधियों की लाइफ भी बचाने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं, जो हम पर फायर कर रहे होते हैं। इकराम उर्फ टोला, जो शामली में पिछले साल अगस्त में मुठभेड़ में मरा, उसे भी तीन घंटे तक मेडिकल ट्रीटमेंट उपलब्ध कराया गया था। हमने मृत्यु के दौरान उसका बयान रिकॉर्ड किया था, जबकि उसने स्वीकार किया था कि उसने एक पुलिस दल पर गोली चलाई थी।…जब कोई चश्मदीद बनने को तैयार नहीं होता, तो हमें वैसा ही लिखना पड़ता है।’

सबसे अधिक 9 मुठभेड़ें मुजफ्फरनगर जिले में एसएसपी अनंत देव के नेतृत्व में हुई थीं। मुठभेड़ों की बाबत उनका नजरिया, ‘हर किसी का अपना नजरिया होता है। हम पुलिस प्रशिक्षण के मुताबिक कार्य करते हैं। जब अपराधियों की गोलियों का सामना कर रहे होते हैं, तो साहस दिखाते हैं।’ किसी पैटर्न को नकारते हुए कहा, ‘सभी मुठभेड़ें अलग हैं और उसी प्रकार एफआईआर दर्ज की गई हैं। रही बात चश्मीद की, तो भय और अदालती कार्यवाहियों से बचने के लिए लोग चश्मदीद बनने से मना कर देते हैं।’

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